कौन हूँ मैं
कभी कभी मैं शून्य हो जाती हूँ
कभी कभी मैं मौन हो जाती हूँ
न जाने कभी कभी मैं कौन हो जाती हूँ
रौंद देती हूँ अपने कई सपनों को
उड़ने न लगूं कही सच में आसमा में
सोच के ही डरने लगता है मेरा मन
और घबरा जाती हूँ सच में तन्हाई से अपने
और खुद से फ़ारिग फ़ौरन हो जाती हूँ मैं
न जाने कभी कभी मैं कौन हो जाती हूँ
तुम से मिले अरसा हो गया सनम
अब तो खवाबों में मिलना जुलना भी गवारा नही
तेरी बेरुखी जो याद आये तो अभी भी
कसम से सनम हैरान हो जाती हूँ मैं
कभी जो मिले तुम राहों में सनम
इस तमन्ना में इक उमर गुजार दी मैंने
मर जायेंगे हम जब मुलाकात हो हमारी
और तुम गर्दन उचककर चले गये
इस सवाल के साथ की कौन हूँ मैं