90 के दौर और jenzi के दौर में हम
बात उन दिनों की है जब हम स्कूल जाते थें। पूरी दुनिया के गम से अंजान क्योंकि हमारे सिर पर हमारे माता पिता का हाथ होता था ।काश ये पता होता कि ये वक्त दुबारा नहीं आएगा क्यूंकि तभी लगता था कि कब पढ़ाई से बस पीछा छूट जाए।
90 का दशक — जब ज़िंदगी की रफ़्तार आज जैसी तेज़ नहीं थी। तब न मोबाइल था, न इंटरनेट, न सोशल मीडिया। रिश्ते स्क्रीन से नहीं, दिल से जुड़े होते थे। दोस्ती का मतलब था रोज़ साथ चलना, साथ हँसना और बिना बोले एक-दूसरे की बात समझ लेना।मैं और मेरी सहेली उसी दौर की पैदाइश हैं। हम दोनों एक ही मोहल्ले में रहते थे और एक ही स्कूल में पढ़ते थे। हर सुबह स्कूल जाने का एक तय समय होता था। कभी-कभी देर हो जाती तो हम भागते हुए स्कूल पहुँचते, रास्ते में हाँफते-हाँफते भी हँसी नहीं रुकती थी।हमारे स्कूल का रास्ता बहुत यादगार था। कच्ची सड़क, दोनों ओर पेड़, और बीच-बीच में छोटे-छोटे घर। रास्ते में मिलने वाली आंटी से रोज़ “नमस्ते” कहना, चाचा की दुकान से टॉफ़ी उधार लेना और फिर स्कूल की घंटी बजने से ठीक पहले गेट के अंदर घुस जाना — ये सब रोज़ की कहानी थी।
क्लासरूम में लकड़ी की बेंचें होती थीं। हम हमेशा साथ बैठते थे। एक ही किताब से पढ़ना, एक ही पेन से लिखना और टीचर के सवाल पूछने पर एक-दूसरे की कॉपी में झाँकना। अगर किसी दिन मेरी कॉपी पूरी नहीं होती, तो वो अपनी कॉपी दे देती और कहती, “आज मेरे से लिख लेना।”लंच टाइम हमारे लिए सबसे ख़ास होता था। टिफ़िन खोलते ही तुलना शुरू हो जाती — किसके टिफ़िन में क्या है। कभी आलू की सब्ज़ी, कभी पराठा, कभी सिर्फ़ सूखी रोटी। फिर भी सब कुछ इतना स्वादिष्ट लगता था क्योंकि हम साथ खाते थे। कभी-कभी एक-दूसरे का टिफ़िन बदल भी लेते थे।स्कूल की शरारतें आज भी याद हैं। कभी क्लास में चिट पास करना, कभी टीचर की नकल उतारना, और कभी प्रार्थना के समय हँसी रोकने की कोशिश करना। पकड़े जाने पर डाँट पड़ती थी, लेकिन वो डाँट भी आज याद आकर मुस्कान दे जाती है।समय बीतता गया। हम बड़ी होने लगीं। बोर्ड की परीक्षाएँ आईं, रिज़ल्ट का डर, भविष्य की चिंता। लेकिन उन सबके बीच हमारी दोस्ती वैसी ही बनी रही। हमें लगता था कि हम हमेशा साथ रहेंगे।फिर स्कूल छूट गया।स्कूल के आख़िरी दिन बहुत भारी थे। आँखों में आँसू थे, लेकिन समझ नहीं आ रहा था कि क्यों। तब शायद यह एहसास नहीं था कि ज़िंदगी का एक बहुत ख़ूबसूरत अध्याय ख़त्म हो रहा है।उसके बाद रास्ते सच में अलग हो गए। कॉलेज, पढ़ाई, घर की ज़िम्मेदारियाँ। कभी-कभार चिट्ठी या किसी के ज़रिए हाल-चाल मिल जाता था, लेकिन पहले जैसी बातें नहीं हो पाती थीं।फिर शादी हो गई।शादी के बाद ज़िंदगी पूरी तरह बदल गई। नया घर, नए रिश्ते, नई जिम्मेदारियाँ। सुबह से रात तक काम ही काम। कभी बच्चों की चिंता, कभी घर-गृहस्थी। इस भागदौड़ में पुरानी दोस्ती धीरे-धीरे पीछे छूटती चली गई।कभी-कभी रात में अकेले बैठकर सोचती थी —“आज वो होती तो कितना अच्छा लगता।”लेकिन ज़िंदगी रुकती नहीं है।फिर एक दिन सोशल मीडिया आया।फेसबुक।शुरुआत में तो बस ऐसे ही अकाउंट बना लिया था। लेकिन एक दिन अचानक स्क्रीन पर एक जाना-पहचाना चेहरा दिखा। वही मुस्कान, वही आँखें — बस चेहरे पर समय की कुछ लकीरें।वो मेरी वही स्कूल वाली सहेली थी।दिल ज़ोर से धड़कने लगा। यकीन नहीं हो रहा था। कुछ देर तक बस तस्वीर देखती रही। फिर हिम्मत करके फ्रेंड रिक्वेस्ट भेज दी।कुछ ही देर में नोटिफ़िकेशन आया —“Request Accepted”और वहीं से बातें फिर शुरू हो गईं।पहला मैसेज था —“पहचाना?”और जवाब आया —“कैसे नहीं पहचानूँगी!”फिर जैसे सालों का सन्नाटा टूट गया। घंटों बातें हुईं। स्कूल के दिन, टीचर, क्लास, दोस्त — सब कुछ एक-एक करके याद आने लगा। हँसी भी आई और आँखें भी नम हो गईं।बीच-बीच में फिर ज़िंदगी आड़े आ गई। बच्चे, काम, परिवार। बातें कम हो गईं, फिर थोड़ा गैप आ गया।
लेकिन इस बार रिश्ता टूटा नहीं।एक दिन किसी ने सुझाव दिया —“क्यों न हम सब स्कूल वाले दोस्त मिलकर एक WhatsApp ग्रुप बना लें?”बस फिर क्या था।ग्रुप बनते ही जैसे पुराना स्कूल फिर से ज़िंदा हो गया। सुबह “Good Morning” से लेकर रात को “Good Night” तक, मैसेज आते रहते हैं।
कभी पुरानी तस्वीरें, कभी किस्से, कभी हँसी-मज़ाक।अब हम अपने बच्चों की बातें करते हैं।कहते हैं —“हमारे ज़माने में ऐसा नहीं होता था।”“हम बिना मोबाइल के भी खुश रहते थे।”“हम दोस्तों के साथ बाहर खेलते थे।”अपने बच्चों की आदतों की तुलना खुद से करते हैं और हँसते हैं। कभी-कभी सोचते हैं कि वक़्त कितना बदल गया, लेकिन कुछ एहसास आज भी वही हैं।उस WhatsApp ग्रुप में हम फिर से वही स्कूल के बच्चे बन जाते हैं।
कोई माँ है, कोई पिता, कोई गृहिणी — लेकिन वहाँ सब सिर्फ़ दोस्त हैं।वो 90 का दौर अब सिर्फ़ यादों में है, लेकिन उन यादों की गर्माहट आज भी हमारे साथ है। ज़िंदगी ने बहुत कुछ बदल दिया, लेकिन दोस्ती को नहीं।और शायद यही सबसे बड़ी बात है —कि समय, दूरी और ज़िम्मेदारियों के बावजूदपुरानी यादें आज भी हमारे दिलों में ज़िंदा हैं।
अब हम सब सहेलियां 40 पार कर चुकी है डर अंदर से लगता है हाय हम बूढ़े हो गए लेकिन ज़ाहिर नहीं होने देती लेकिन सबको सब याद दिलाती रहती है एक दिन क्या हुआ एक ब्राह्मण दोस्त जिसकी शादी शायद 10वीं के बाद हो गई होगी उसको देखा 25वी सालगिरह मना रही है दिमाग का दही हो गई बेटी जॉब कर रही है और अब तक उसकी शादी तो हो गई थी कहानी बताने तक लेकिन मुझे पता यकीन है वो नानी भी बन ही गई होगी मन ये ये सब बदलाव नहीं चाह रहा है बस वो बच्चा बनकर बेफ्रिक होकर जीना छ रहा है लेखी। वक्त कब ठहरता है किसकी सुनता है उसके साथ तो चलना ही परता है।
