digital haat ke yug me imagination khota bachhe
जब हम छोटे बच्चे थे, 1990 का दौर था, रेडियो सुनते थे।सैनिकों के लिए कार्यक्रम आते थे। सैनिक चिट्ठी लिखकर भेजते थे, दूरदर्शन में तब जाकर उनका गाना उन्हें सुनाया जाता था।और एक पोस्टकार्ड होती थी जिसमें जितने सैनिकों के नाम होते थे, रेडियो एंकर जिसे हम आरजे भी कहते हैं, सबके नाम की घोषणा करते थे और उनके फेवरेट गाने सुनाए जाते थे।
बताओ आज के यूट्यूब के दौर वाले बच्चे एक क्लिक में कार्टून से लेकर मूवी तक सब अपनी मर्जी से देख सकते हैं, लेकिन हम पूरे सप्ताह इंतजार करते थे।रेडियो पर एक और प्रोग्राम आता था हेलो फरमाइश कमल करके उसके नाम था। उनका हर शुक्रवार को शाम 4 बजे आता था वो प्रोग्राम। मैंने कितनी बार फोन पर ट्राय किया लेकिन कभी लगा नहीं, उसका अफसोस मुझे जिंदगी भर रहेगा।
आज के बच्चे इस दर्द को कभी नहीं समझेंगे।जब टीवी आया, महाभारत देखने के लिए मेरे मामा मुझे साइकिल पर बिठाकर दूसरे गांव ले जाया करते थे। घर के बाहर टीवी को रख दिया जाता था और जब नेटवर्क चला जाए तो एंटीना हिला कर ऊपर वाला पूछता, छत से — नेटवर्क आया क्या?फिर मेरे मामा जी की शादी में दहेज में टेलीविजन मिला तो हमें राजा की तरह फीलिंग आने लगी थी क्योंकि सारे दोस्तों में मेरा मान जो बढ़ गया था।
बिजली तो थी नहीं, जैसे ही वीकेंड आने वाला होता बैटरी चार्ज के लिए खुशामद करना — ये आज के बच्चों को क्या समझ आएगा।जब जंगल जंगल फूल खिला है वाला बच्चा मोगली आता था तो लगता था वक्त रुक जाए और जब सीरियल चला जाता था तो लगता था काश रोज संडे ही रह जाए।हम तभी सोचा करते थे कि क्या होगा, अब क्या होगा। ऐसा भी हो सकता है, वैसा भी हो सकता है।
लेकिन आज के बच्चे एक क्लिक पर कार्टून देखते हैं, उन्हें इंतजार नहीं करना पड़ता। इस तरह से अपने दिमाग पर जोर नहीं डालते, जिससे उनकी इमैजिनेशन पावर घट रही है।एड भी बहुत प्यारा था।हमारे जमाने में एड भी हम बहुत प्यार से देखते थे जिससे हमारे अंदर थोड़ी धैर्य भी था।लेकिन अब तो बच्चे साइड एड को स्किप कर देते हैं, जिससे दिखता है उनके अंदर पेशेंस की मात्रा बिल्कुल भी नहीं है।
कहानी का युग समाप्त हो गया।अब बच्चे कहानी नहीं सुनते क्योंकि हमने अपने बच्चों को मोबाइल दे दिया। पहले नेट कम मिलता था, मम्मी को बच्चे परेशान न करें इसलिए फ्री वाई-फाई लगा रखे हैं सबने अपने-अपने घरों में।लेकिन जब हम अपने जमाने में खाने के समय, सोने के समय में कहानी-किस्से सुनते थे तो हमारी आंखों के सामने वो सारे सीन चलते रहते थे। विजुअलाइजेशन पावर बढ़िया थी।लेकिन बच्चे अब विजुअल नहीं सोचते, वो तो वर्चुअल वर्ल्ड है।सब वर्चुअल हो गया है।
वर्चुअल वर्ल्ड डिजिटल हाट पर लोग मिलने लगे हैं।ऑनलाइन सब्जी तो Zepto, ऑनलाइन खाना तो Zomato, ऑनलाइन कपड़े Myntra। हर चीज के लिए अलग ऐप।दोस्ती के लिए Facebook। हर बात के लिए एक एप्लिकेशन, लेकिन अहसास के लिए कोई एप्लिकेशन नहीं।
भावना को खो रहे हैं डिजिटल हाट के युग में।इमैजिनेशन पावर की कमी हो रही है बच्चों के आज के युग में, वर्चुअल युग में।ChatGPT ने तो जाने कितने लोगों की नौकरी छीन ली हैं।जाने किस तरक्की की दौड़ में हम भागे जा रहे हैं जो हमसे सब छूट रहा है, सबसे हमें दूर कर रहा है।थोड़ा रुकना होगा, थोड़ा सोचना होगा।
