सेवा
एक दिन सर्दियों की रात में राधा काम से घर लौट रही थी। रास्ते में उसे एक बूढ़ा व्यक्ति दिखाई दिया, जो भूख और ठंड से काँप रहा था।
उसके कपड़े फटे हुए थे और चेहरे पर थकान साफ दिखाई दे रही थी।बूढ़े ने धीमी आवाज में कहा, “बेटी, सुबह से कुछ नहीं खाया। अगर हो सके तो थोड़ी रोटी दे दो।”राधा के पास उस दिन केवल दो रोटियाँ थीं, जो उसने अपनी बेटी के लिए बचाकर रखी थीं।
वह कुछ पल सोच में पड़ गई। फिर उसने अपनी एक रोटी बूढ़े को दे दी और अपना पुराना शॉल भी उसके कंधों पर डाल दिया।बूढ़े ने पूछा, “बेटी, तुम खुद गरीब हो। फिर भी अपनी रोटी मुझे दे दी। तुम्हें अपने परिवार की चिंता नहीं हुई?”राधा मुस्कुराई और बोली, “बाबा, मेरी बेटी आधी रोटी खाकर भी सो सकती है, लेकिन अगर मैं आपकी मदद न करूँ, तो शायद आज रात आप भूखे ही रह जाएँ।
किसी की तकलीफ देखकर आँखें बंद कर लेना कैसी इंसानियत है?”यह सुनकर बूढ़े की आँखों में आँसू आ गए।अगले दिन शहर में खबर फैली कि एक अनजान बूढ़े व्यक्ति की तबीयत बिगड़ गई थी और उसे अस्पताल पहुँचाने में राधा ने मदद की थी।
वह बूढ़ा शहर का एक सम्मानित समाजसेवी निकला, जो गरीबों की स्थिति जानने के लिए साधारण कपड़ों में निकला था।
उसने राधा की ईमानदारी और दयालुता से प्रभावित होकर उसकी बेटी की पढ़ाई की जिम्मेदारी उठाई और राधा को रोजगार का एक अच्छा अवसर भी दिलाया।
जब मोहन व्यापारी को यह बात पता चली, तो उसे अपनी गलती का एहसास हुआ। उसने समझा कि केवल मंदिर जाना और दान की बातें करना ही पर्याप्त नहीं है। सच्चा धर्म तो किसी जरूरतमंद के दुख को समझने और उसकी सहायता करने में है।
