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apne bachhon par faishle n thope baithe or nishkarsh nikale

आज सुबह से एक खबर चर्चा का विषय बनी हुई है। आपने भी देखी होगी, कुछ पल के लिए ठहर गए होंगे, मन में चिंता हुई होगी और सोचने पर मजबूर हो गए होंगे।मैं उसी खबर की बात कर रही हूँ जिसमें एक बेटे ने अपनी बहन के सामने अपने ही पिता की हत्या कर दी।

पिता की उम्र महज 49 वर्ष थी। बेटा पिता की महत्वाकांक्षाओं से परेशान था। पिता चाहते थे कि बेटा मेडिकल की पढ़ाई करे ताकि वह उनकी लैब को आगे बढ़ा सके।लेकिन बेटा अपना खुद का रेस्टोरेंट खोलना चाहता था।

वह सही और गलत के बीच फर्क नहीं समझ पाया और तनाव में इतना डूब गया कि उसने अपने ही पिता को गोली मार दी और शव को नीले ड्रम में छिपा दिया।आजकल “नीले ड्रम” की घटनाएँ जैसे एक अलग ही चर्चा का विषय बन गई हैं। ऐसा लगता है जैसे अपराध करने वाले पहले से सोचते हैं कि यदि लाश छिपानी पड़ी तो क्या करेंगे।

पहले भी Muskan Rastogi के मामले में ड्रम का जिक्र सामने आया था, जिसने पूरे देश को हिला दिया था।

लेकिन असली मुद्दा यह है कि एक पिता केवल इसलिए मारा गया क्योंकि वह अपने बेटे के भविष्य को लेकर चिंतित था, और बेटा कुछ और करना चाहता था। आज पूरा पिता समाज इस घटना से अंदर तक हिल गया होगा। मैंने तो अपने साढ़े नौ साल के बेटे से भावुक होकर यह तक पूछ लिया कि अगर हम तुम्हें जबरदस्ती पढ़ने को कहें तो क्या तुम भी ऐसा करोगे?

कई माता-पिता शायद यह सवाल पूछने की हिम्मत भी नहीं कर पाते।यह सचमुच बहुत गंभीर विषय है।बच्चों पर जबरदस्ती क्यों करें? अपने सपने उन पर क्यों थोपें?आज के समय में लोगों की सहनशक्ति कम होती जा रही है। यदि हम उनके भविष्य के लिए योजनाएँ बना रहे हैं, तो पहले यह समझना जरूरी है कि उनकी रुचि किस क्षेत्र में है। उसके बाद ही कोई निर्णय लें। हर तरफ प्रतियोगिता है, और कई बच्चे बहुत संवेदनशील होते हैं।

वे अपने करियर को लेकर उलझ जाते हैं और सही फैसला नहीं कर पाते।एक माता-पिता के रूप में हमें अपने बच्चों को नियंत्रित करने से ज्यादा उनका विश्वास जीतना चाहिए। यदि हम उनके दोस्त बनकर रहेंगे तो वे अपनी बातें खुलकर साझा करेंगे। यह सोचकर कि हमारे माता-पिता ने हमारे साथ जैसा किया, हम भी वैसा ही करेंगे — अब यह तरीका काम नहीं करेगा। समय बदल चुका है।

अपने बच्चों को अपना दोस्त बनाइए। फैसले थोपिए नहीं, मिलकर चर्चा कीजिए। यदि उन्हें पसंद आए तो ठीक, नहीं तो बात को वहीं छोड़ दीजिए। क्योंकि सच तो यह है कि जब आप छोड़ना सीख लेते हैं, तभी आप सच्ची खुशी से रह पाते हैं।

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