बिहार का लोकप्रिय चावल का पीठा जो सर्दियों में बनाया जाता है हर बिहारियों की है पसंद।
written by sadhana bhushan
photo credit goes to Swarnim ramesh Karn
यह व्यंजन बिहार का पारंपरिक “चावल का पिठ्ठा (पीठा)” है में शुद्ध, मौलिक बिहार का पारंपरिक व्यंजन: चावल का पिठ्ठा (पीठा)
बिहार की मिट्टी, संस्कृति और खान–पान की अपनी अलग पहचान है। यहां के पारंपरिक व्यंजन सादगी, पोषण और स्वाद का अनोखा मेल होते हैं। इन्हीं व्यंजनों में एक बेहद प्रसिद्ध और लोकजीवन से जुड़ा हुआ पकवान है चावल का पिठ्ठा, जिसे कई जगहों पर पीठा भी कहा जाता है। यह व्यंजन खास तौर पर ग्रामीण बिहार, मिथिलांचल, मगध और सीमावर्ती झारखंड क्षेत्रों में बड़े चाव से खाया जाता है।
आईए जानते हैं कि क्या है पिठ्ठा ?
पिठ्ठा मूल रूप से चावल के आटे से बना एक उबला हुआ व्यंजन है, जिसे आकार में आधे चंद्रमा (चांद जैसी शक्ल) का बनाया जाता है। इसे आमतौर पर भाप में पकाया जाता है, इसलिए यह हल्का, सुपाच्य और स्वास्थ्य के लिए लाभकारी माना जाता है।
पिठ्ठा बाहर से मुलायम और अंदर से नरम होता है, जो खाने में बेहद सादा लेकिन स्वादिष्ट लगता है।
पिठ्ठा का क्या है सांस्कृतिक महत्व हम आपको ये बताते हैं।
बिहार में पिठ्ठा सिर्फ एक भोजन नहीं, बल्कि लोकसंस्कृति और पारिवारिक परंपराओं से जुड़ा हुआ व्यंजन है। इसे अक्सर:सर्दियों के मौसम में खेतों में काम करने के बाद सुबह या शाम के हल्के भोजन के रूप में लोग खाना पसंद करते हैं।
त्योहारों या सामूहिक बैठकों में इसे तैयार किया जाता है। गांवों में महिलाएं एक साथ बैठकर पिठ्ठा बनाती हैं, जो सामाजिक मेलजोल और पारिवारिक एकता का प्रतीक भी है। जैसे पहले लोग एक साथ सर्दियों में बैठ गए और एक साथ बातों ही बातों में ये स्वादिष्ट व्यंजन तैयार कर लिया जाता था।
आईए जानते है कि क्या है पिठ्ठा बनाने की पारंपरिक विधि और ये अभी भी कैसे मिथिला में ये परम्परा जिंदा है।
पिठ्ठा बनाने के लिए बहुत ज्यादा सामग्री की जरूरत नहीं होती, यही इसकी खासियत है।मुख्य सामग्री:चावल का आटा,नमक (स्वादानुसार)गुनगुना पानी बस ये मुख्य सामग्री है ।सबसे पहले चावल के आटे में हल्का नमक मिलाकर गुनगुने पानी से नरम आटा गूंथा जाता है। फिर आटे की छोटी-छोटी लोइयां बनाकर उन्हें हाथ से दबाकर आधे चंद्रमा का आकार दिया जाता है। इसके बाद इन्हें भाप में अच्छी तरह पकाया जाता है। पकने के बाद पिठ्ठा सफेद, नरम और हल्का फूल जाता है। और खाने के लिए तैयार है। लेकिन महिलाएं इसके अंदर गुड़ या आलू या दाल नहीं तो सत्तू फिल कर देती हैं ताकि डिनर कर लिया तो पेट पूरा भर जाता है ।
पिठ्ठा कैसे खाया जाता है?
पिठ्ठा को आमतौर पर चोखा, दाल, सरसों की चटनी, टमाटर की चटनी या देसी घी के साथ खाया जाता है। कई लोग इसे:लहसुन–मिर्च की चटनी या तिल की चटनी या सादा नमक–घी के साथ खाना पसंद करते हैं। इसका स्वाद सादा होने के कारण यह साथ में परोसी जाने वाली चीजों का स्वाद और भी बढ़ा देता है।
स्वास्थ्य की दृष्टि से पिठ्ठा के कई गुणकारी लाभ भी हैं।
चावल का पिठ्ठा तेल–मसाले से मुक्त होता है, इसलिए यह स्वास्थ्य के लिए काफी फायदेमंद माना जाता है। और ये नवंबर दिसंबर महीने में कई कारण से बनाया जाता है चूंकि इस महीने में नया चावल खेतों से तैयार होकर आता है तो इसका स्वाद भी कई गुना बढ़ा होता है।
इसके प्रमुख लाभ:
हल्का और आसानी से पचने वाला ये व्यंजन पेट के लिए फायदेमंद बहुत है ।वजन नियंत्रित करने वालों के लिए उपयुक्त है ।बच्चों और बुजुर्गों के लिए सुरक्षित भी है ।गैस और एसिडिटी की समस्या में लाभकारी है अगर आपको ज्यादा गैस की निजी समस्या नहीं हो तो वरना गैस के मरीजों को चावल और उससे बनने वाली रेसिपी से अपने स्वस्थ के हिसाब से कंज्यूम करना चाहिए।
बिहार के कटिहार और पूर्णिया जैसे शहरों में फास्ट फूड के तौर पर सड़कों पर बना कर बेचा जाता है और लोग सड़क पर सर्दियों की रात में गर्म गर्म खाते हैं।
फास्ट फूड के दौर में पिठ्ठा जैसे पारंपरिक व्यंजन एक स्वस्थ विकल्प साबित होते हैं।बदलते समय में पिठ्ठा आज भी बिहार के गांवों में पिठ्ठा उसी पारंपरिक तरीके से बनाया जाता है, लेकिन शहरों में अब इसे नए अंदाज में भी अपनाया जा रहा है। कुछ लोग इसमें:सब्जियों की स्टफिंग मसालेदार भराव नया हल्का तड़का लगाकर इसे आधुनिक रूप दे रहे हैं। इसके बावजूद इसकी मूल पहचान और सादगी आज भी बनी हुई है।
निष्कर्ष
चावल का पिठ्ठा बिहार की सांस्कृतिक विरासत और देसी जीवनशैली का प्रतीक है। यह दिखाता है कि कम साधनों में भी स्वाद और सेहत दोनों को साथ लेकर चला जा सकता है। पिठ्ठा सिर्फ पेट भरने का साधन नहीं, बल्कि मिट्टी से जुड़ाव, परंपरा और अपनापन दर्शाने वाला व्यंजन है।
