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डिजिटल मीडिया और हमारा बचपन।

हमारे बचपन की यादें: बदलती दुनिया में सिमटता बचपन, यादों में आज भी ज़िंदानई दिल्ली | विशेष रिपोर्टतेज़ रफ्तार ज़िंदगी, मोबाइल फोन, सोशल मीडिया और डिजिटल दुनिया के बीच आज का इंसान कहीं न कहीं अपने बचपन को पीछे छोड़ चुका है। लेकिन जैसे ही पुराने गाने कानों में पड़ते हैं या किसी स्कूल की घंटी की आवाज़ सुनाई देती है, मन अनायास ही बचपन की गलियों में लौट जाता है।

बचपन की यादें सिर्फ़ अतीत नहीं हैं, बल्कि वो एहसास हैं जो आज भी इंसान को भीतर से जोड़कर रखते हैं।वो दौर जब खुशियाँ साधारण थीं90 के दशक या उससे पहले का बचपन आज की पीढ़ी के लिए किसी कहानी से कम नहीं लगता। तब न महंगे खिलौने थे, न मोबाइल गेम्स। कंचे, गिट्टे, लट्टू, पिट्ठू, कबड्डी और गली क्रिकेट ही सबसे बड़ा मनोरंजन हुआ करते थे। शाम होते ही बच्चे घर से बाहर निकल जाते थे और अंधेरा होने पर ही लौटते थे।माँ की आवाज़ दूर से सुनाई देती थी

—“अब घर आ जाओ!”उस आवाज़ में डाँट भी होती थी और प्यार भी।स्कूल और दोस्ती की अनमोल यादेंबचपन की यादों में स्कूल का ज़िक्र न हो, ऐसा हो ही नहीं सकता। लकड़ी की बेंच, स्लेट और चॉक, स्कूल बैग का बोझ और टीचर की सख़्ती — सब कुछ आज भी यादों में ताज़ा है। लंच ब्रेक में टिफ़िन खोलकर एक-दूसरे का खाना चखना और रिज़ल्ट के दिन दोस्त का हाथ थामे खड़ा रहना, उस दौर की सच्ची दोस्ती को दर्शाता है।

आज जब वही बच्चे बड़े होकर अपने-अपने काम और परिवार में व्यस्त हैं, तो सोशल मीडिया के ज़रिए फिर से जुड़कर उन्हीं यादों को ताज़ा कर रहे हैं। फेसबुक और व्हाट्सऐप पर बने स्कूल फ्रेंड्स ग्रुप्स इस बात का सबूत हैं कि बचपन की दोस्ती कभी पुरानी नहीं होती।डिजिटल युग में बदलता बचपन विशेषज्ञ मानते हैं कि आज का बचपन पहले से काफ़ी अलग हो चुका है। मनोवैज्ञानिकों के अनुसार, मोबाइल और इंटरनेट ने बच्चों की दुनिया को सीमित कर दिया है।

जहाँ पहले बच्चे बाहर खेलते थे, वहीं आज ज़्यादातर समय स्क्रीन के सामने बीत रहा है।बाल मनोवैज्ञानिक डॉ. अनिल कुमार बताते हैं,“बचपन की यादें व्यक्ति के मानसिक विकास में अहम भूमिका निभाती हैं। जो लोग अपने बचपन को खुलकर जी पाए होते हैं, वे भावनात्मक रूप से अधिक संतुलित होते हैं।”माता-पिता भी यादों में लौट रहे हैंआज के माता-पिता जब अपने बच्चों को मोबाइल में उलझा देखते हैं, तो अक्सर अपने बचपन की तुलना करते हैं।

“हमारे ज़माने में ऐसा नहीं था” — यह वाक्य लगभग हर घर में सुनाई देता है।कई अभिभावक अब जानबूझकर बच्चों को पार्क, मैदान और गांव की ओर ले जाने लगे हैं, ताकि वे भी कुछ वैसी ही यादें बना सकें, जैसी यादें आज बड़े होकर उन्हें सुकून देती हैं।सोशल मीडिया बना यादों का पुलजहाँ एक ओर सोशल मीडिया को समय की बर्बादी कहा जाता है, वहीं दूसरी ओर यही माध्यम लोगों को उनके बचपन से जोड़ने का काम भी कर रहा है। स्कूल के पुराने दोस्त, बिछड़े रिश्ते और भूली-बिसरी तस्वीरें आज फिर से ज़िंदगी का हिस्सा बन रही हैं।व्हाट्सऐप ग्रुप्स में रोज़ स्कूल के किस्से, पुरानी तस्वीरें और हँसी-मज़ाक साझा किए जाते हैं। यह साफ़ दिखाता है कि बचपन की यादें सिर्फ़ याद नहीं, बल्कि आज की ज़िंदगी में सुकून का ज़रिया बन चुकी हैं।बचपन: जो कभी पुराना नहीं होतासमय बदलता है, ज़िंदगी आगे बढ़ती है, लेकिन बचपन की यादें कभी बूढ़ी नहीं होतीं। यही यादें इंसान को मुश्किल वक्त में हौसला देती हैं और मुस्कुराने की वजह बनती हैं।आज जब दुनिया तेज़ी से बदल रही है, तब ज़रूरत है कि हम अपने बच्चों को भी ऐसा बचपन दें, जिसे वे कल गर्व और मुस्कान के साथ याद कर सकें।क्योंकि बचपन सिर्फ़ उम्र नहीं,एक एहसास है —जो यादों में हमेशा ज़िंदा रहता है।

अगर आप अपने घर के बच्चों से पूछेंगे या किसी भी बच्चे से बेटा आओ कहानी सुनाते हैं तो वो आश्चर्य करेगा कि आखिर ये बात किस की कर रहा है ये कौन सी बला है ।उसे कोई मजेदार बात नहीं लगेगी क्योंकि शायद उसने इससे पहले कोई कहानी सुनी नहीं होगी या सुनाई गई नहीं होगी आजकल के पेरेंट्स भी हल्का रहना चाहते हैं वो बच्चों को अपने ऊपर लटकना पटकना पसंद नहीं करते क्योंकि उतने देर में वो खुद भी रील देख लेंगे । कई कार्टून चैनल बंद हो गए क्योंकि बच्चों कंपास टाइम नहीं है ।

निष्कर्ष यूंही अगर हम बच्चों को मोबाइल के करीब छोड़ते रहेंगे तो एक दिन वो हम सब से दूर हो जाएंगे । अभी मैने एक बच्ची को देखा जो क़रीब 2 साल की थी उसे खाना नहीं आता था मैने सुना कि उसकी mumy किसी जगह जाती है तो उसका खाना साथ ले जाती है क्योंकि वो एक ही तरह का खाना खाती है वो भी लिक्विड ही लेकिन उस बच्ची का हाथ मोबाइल पर प्रॉपर चल रहा था यानी वो बाते समझ रही थी हाथ रील को स्क्रॉल कर रहा था । मतलब ये सब उसके मन की बदमाशी थी फोन चलाऊंगी लेकिन खाऊंगी नहीं आजकल बच्चे मां बाप को खूब ब्लैकमेल करते हैं कि फोन नहीं दोगे तो खाऊंगा नहीं मेरा 9 साल का बेटा भी यही करता है वो खाता ही नहीं रहता जब फोन देखेगा तो पूरा खायेगा मजबूरी है नहीं दूंगी तो नहीं खायेगा । लेकिन मैं बातों ही बातों में उसे कहानियां सुनाती रहती हूं ताकि वो अपने सोचने समझने की क्षमता को बढ़े कल्पना शक्ति को बढ़ाए। वाकई में हमारे ज़माने में नहीं खाना मतलब थप्पड़ खाना ही होता था ।लेकिन आजकल के बच्चों को सब मिल गया है तो उन्हें किसी बात की कदर ही नहीं है। इस डिजिटल मीडिया के दौर में हम आगे तो बढ़ रहे हैं लेकिन पीछे बहुत कुछ झूट रहा है जिसका कोई हिसाब नहीं है।

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