इंदौर में जल प्रदूषण पर विवाद : कैलाश विजयवर्गीय का बयान, वैज्ञानिकों की प्रतिक्रिया
:इंदौर में जल प्रदूषण पर विवाद: कैलाश विजयवर्गीय का बयान, वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों की प्रतिक्रिया
इंदौर (मध्य प्रदेश)। शहर के भागीरथपुरा इलाके में दूषित जल की वजह से फैल रही बीमारी और मौतों के मामले ने एक बार फिर से जल प्रदूषण को बड़ा मुद्दा बना दिया है।
स्थानीय अधिकारियों की पक्षपातपूर्ण टिप्पणियों और वैज्ञानिक जांच की मांग के बीच यह मामला राजनीतिक और वैज्ञानिक बहस का रूप लेता जा रहा है।मध्य प्रदेश के वरिष्ठ नेता कैलाश विजयवर्गीय ने जल प्रदूषण के मुद्दे पर बयान देते हुए कहा कि प्रशासन और स्थानीय निकाय पूरी गंभीरता से कार्य कर रहे हैं तथा पानी की आपूर्ति को जल्द से जल्द सुरक्षित बनाया जा रहा है। उन्होंने यह भी दावा किया है कि अस्पतालों में भर्ती अधिकांश मामलों में गंभीर खतरे की स्थिति नहीं है और एम्फ़लियन (कुछ रिपोर्ट के अनुसार सरकार द्वारा जारी बयान में कहा गया) महज अफवाहें हैं। हालांकि खुद मंत्री के बयान में मौतों की संख्या को लेकर स्पष्टता नहीं थी और अलग-अलग आंकड़े सामने आये।
वहीं दूसरी ओर वैज्ञानिकों और पर्यावरण विशेषज्ञों ने इस मामले को गंभीर मानते हुए आवश्यक वैज्ञानिक जांच और त्वरित कार्रवाई की मांग की है। मध्य प्रदेश के नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ़ बैक्टीरियोलॉजी तथा अन्य विशेषज्ञों की टीम ने भगीरथपुरा में पानी के सैंपलिंग और माइक्रोबायोलॉजिकल परीक्षण शुरू कर दिए हैं ताकि यह पता लगाया जा सके कि दूषित पानी में कौन-सी बैक्टीरिया या रोगजनक तत्व हैं जो लोगों को बीमार कर रहे हैं। यह जांच अभी भी जारी है और विशेषज्ञों का कहना है कि तकनीकी रिपोर्ट आने में 8 से 10 दिन लग सकते हैं।
।।प्रारंभिक लैब जांचों में यह बात स्पष्ट हुई है कि शहर के जल आपूर्ति नेटवर्क में कहीं से सीवेज (नालों का गंदा पानी) मिश्रित हो रहा है, जिससे पानी की गुणवत्ता गिर गई है और लोगों को पेट के संक्रमण, दस्त, उल्टी तथा बुखार जैसे लक्षण देखने को मिल रहे हैं। अधिकारियों की मानें तो कुछ स्थानों पर पानी की नली के पास एक टॉयलेट का स्थान होना, और वहाँ से गंदा पानी पीने के पानी की पाइप में जाकर शामिल होना संभव कारण बताया जा रहा है।
जल संरक्षण के लिए लंबे समय से काम कर रहे प्रसिद्ध विशेषज्ञ राजेंद्र सिंह, जिन्हें ’भारत के जलपुरुष’ के नाम से जाना जाता है, ने इस पूरे प्रकरण को “सिस्टम द्वारा निर्मित आपदा” बताया है। उनका कहना है कि यदि पानी की गुणवत्ता इतनी खराब हो सकती है कि शहर में इससे मौतें हों, तो यह केवल लापरवाही का परिणाम नहीं बल्कि बुनियादी सिस्टम में गड़बड़ी और भ्रष्टाचार का संकेत है। उन्होंने आरोप लगाया कि भ्रष्टाचार और गलत निर्माण तथा रख-रखाव की वजह से ही पानी की पाइप लाइनें नालों के पास बिछाई जा रही हैं, जिससे दूषित जल आसानी से मिश्रित हो जाता है। सिंह ने यह भी कहा कि साल दर साल ग्राउंडवाटर का स्तर गिर रहा है और शहर नरमदा नदी पर अत्यधिक निर्भर हो चुका है, जबकि अधिक सतत जल प्रबंधन प्रणाली विकसित नहीं की गयी।विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि इस तरह की जल आपूर्ति प्रणाली में किसी भी तरह की लापरवाही से बीमारियों का फैलाव बहुत तेज़ी से हो सकता है।
दूषित पानी से फैलने वाले रोगों में दस्त, टाइफाइड, हैज़ीटिस जैसे संक्रमण शामिल हैं, जिनके लिए समय पर चिकित्सा और पब्लिक हेल्थ इंटर्वेंशन की आवश्यकता होती है।इस बीच स्थानीय प्रशासन और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा बड़े पैमाने पर सैंपलिंग अभियान शुरू किया गया है, जिसमें 70 से अधिक जल नमूनों को विभिन्न स्रोतों से लिया गया और उन्हें विश्लेषण के लिए भेजा जा रहा है। बोर्ड के अधिकारी यह पता लगाने में जुटे हैं कि दूषित पानी कितने इलाकों में पहुँच चुका है और क्या यह केवल पाइपलाइन लीकेज की वजह से हुआ या कहीं और से भी सीवेज मिश्रण जारी है।
राजनीतिक दलों और नागरिक संगठनों भी इस मुद्दे पर आवाज उठा रहे हैं। युवा कांग्रेस समेत अन्य गठबंधनों ने बड़े स्तर पर विरोध प्रदर्शन किये हैं और सरकार से जवाबदेही तय करने तथा ऐसे प्रदूषण की पुनरावृत्ति रोकने के उपाय लागू करने की मांग की है।
विशेषज्ञों की राय में यह आवश्यक है कि जल्द से जल्द तकनीकी अध्ययन के आधार पर सुधारात्मक कार्रवाई की जाए और नागरिकों को शुद्ध पेयजल की सुनिश्चित आपूर्ति हो। जल संसाधनों के उचित प्रबंधन और नगर जल प्रणाली की मरम्मत के बिना ऐसे हादसे दोबारा हो सकते हैं।
