छोटी सी टोपी का बड़ा किस्सा
आज मुझे इतनी हँसी आ रही थी कि अगर लिख न लेती, तो शायद पेट ही फूल जाता।
कहानी शुरू होती है एक छोटी सी टोपी से… लेकिन बात सिर्फ टोपी की नहीं है, बात है माँ के दिल की।
करीब महीने दो महीने पहले ही मैंने अपने 9 साल के बेटे के लिए बाज़ार से स्कूल की ड्रेस से मैच करती हुई एक टोपी खरीदी थी।
बड़ी मेहनत से चुनी गई, रंग भी एकदम यूनिफॉर्म जैसा। लेकिन टोपी को घर आए मुश्किल से एक दिन ही हुआ होगा कि साहब ने उसे गुम कर दिया।
और मैं… मैं पूरी तरह परेशान।न बेटे को याद कि टोपी कहाँ रह गई, न वो ढूंढ पा रहा था।और इधर मैं ठान चुकी थी—टोपी ढूंढकर ही रहूंगी।उसके दोस्तों के घर, ट्यूशन, स्कूल—जहाँ-जहाँ वो जाता था, मैं सब जगह चक्कर काट आई। स्कूल की मेड से लेकर आसपास की दुकानों तक पूछताछ हो गई। टोपी बहुत थीं, लेकिन वही वाली नहीं—जो स्कूल ड्रेस से मिलती-जुलती हो।
मैं अपने बेटे से बहुत अटैच हूँ। उसकी हर चीज़ से—खिलौने, कपड़े—सबसे। पुराने हो जाएँ, तब भी दिल नहीं करता किसी को देने का।
मजबूरी में जगह की कमी के कारण देना पड़ता है। अभी हाल ही में उसकी पहली साइकिल कबाड़ी वाले को दी, बिल्कुल सही हालत में थी। घोड़ा और तीपाही साइकिल किसी और बच्चे को दे दी, लेकिन सच कहूँ तो ऐसा लगा जैसे जिगर का टुकड़ा दे दिया हो।
कपड़े तो ज़रूरतमंदों को देती रहती हूँ, फिर भी उसकी पहली यूनिफॉर्म, ब्लेज़र आज भी संभालकर रखे हैं। अजीब बात है—बच्चों के बड़े होने पर उतनी खुशी नहीं होती, जितनी उनके छोटे होने पर होती थी। तब लाड़-प्यार था, अब पढ़ाई के लिए डांटना पड़ता है। ज़रूरी है, लेकिन बच्चा समझता है कि माँ अब प्यार नहीं करती। इसी वजह से ट्यूशन भी लगानी पड़ी, वरना पढ़ा तो मैं खुद ही सकती थी।
खैर, टोपी की तलाश में मैंने पूजा घर तक उलट-पलट कर दिया। , फिर भी टोपी नहीं मिली।
आख़िरकार मैंने सब्र कर लिया—अब नहीं मिलेगी।सोच लिया कि पिछले साल की टोपी से ही काम चला लेंगे। सर्दियों के कपड़े समेटते वक्त लगा था, शायद किसी कपड़े में छुपी हो, बेड के नीचे दब गई हो। अलमारी और बेड के नीचे कई बार सफाई हुई, लेकिन टोपी का कोई अता-पता नहीं।
इसी बीच बोतल का किस्सा भी चल पड़ा। मेरा बेटा टोपी ही नहीं, पानी की बोतल भी अकसर छोड़ देता है। एक बार तो लाइब्रेरी में बोतल ढूंढने के लिए सीसीटीवी तक देखने की नौबत आ गई। मैनेजर ने मज़ाक में पूछा,“1000-2000 की बोतल थी क्या?”हमने कहा—हाँ।वो चुप हो गया।हम लोग तो बचपन में चापाकल से पानी पीते थे, इन बच्चों को क्या पता लाइन लगाकर पानी पीना क्या होता है।एक दिन फिर फोन आया—बाबू स्कूल की डेस्क पर बोतल छोड़ आया है।अब लगा कि टोपी का सदमा कम था जो बोतल का शोक शुरू हो गया।कीचड़, सीवर के पानी और एक रिक्शेवाले की नाखुशी से लड़ती हुई मैं स्कूल पहुँची। गेट पर मेड ने ताना मार दिया—“टोपी तो बैग में ही थी।”माथा घूम गया। टोपी नहीं मिली थी, ऊपर से ताने अलग। बेटे ने स्कूल में कह दिया था कि टोपी बैग में मिल गई। मैंने सबके सामने कह दिया—“वो झूठ बोल रहा है।”बाद में घर पहुँचकर असलियत सामने आई।जिस टोपी के लिए मैंने पूरा शहर सिर पर उठा लिया था, वो स्केटिंग वाले बैग में थी, और वो बैग स्कूल में ही रहता है। आज कुछ ढूंढते वक्त टोपी मिल गई।जिसे गली-गली ढूंढा, वो घर में ही थी।अब सोचती हूँ—कल सब मेरे बेटे को भी डांटेंगे और मुझे भी गलत कहेंगे। मेड आएगी तो वो भी सुनाएगी। लेकिन सच ये है कि ये कहानी टोपी या बोतल की नहीं थी।ये कहानी हैएक माँ के उस प्यार की,जो 150 रुपये की टोपी में भीअपने बच्चे का पूरा बचपन ढूंढ लेती है.
