सऊदी अरब ने रूस को पीछे छोड़ा, भारत का सबसे बड़ा तेल सप्लायर बनने की राह पर
रूस को पीछे छोड़ सऊदी अरब बना भारत का सबसे बड़ा कच्चा तेल आपूर्तिकर्तानई दिल्ली।भारत के ऊर्जा बाजार में बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है।
सऊदी अरब से कच्चे तेल (क्रूड ऑयल) की खरीद में तेजी आने के बाद वह जल्द ही भारत का सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता बनने की स्थिति में पहुंच गया है। हालिया आंकड़ों के अनुसार फरवरी महीने में सऊदी अरब से तेल आयात पिछले कई वर्षों के उच्चतम स्तर पर पहुंच गया है, जिससे रूस के साथ अंतर काफी कम हो गया है।रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद भारत ने रियायती दरों पर रूस से बड़े पैमाने पर कच्चा तेल खरीदा था।
इसी कारण रूस कुछ समय के लिए भारत का प्रमुख आपूर्तिकर्ता बन गया था। लेकिन अब वैश्विक परिस्थितियों, आपूर्ति शृंखला और मूल्य संतुलन में बदलाव के कारण सऊदी अरब की हिस्सेदारी फिर से बढ़ती नजर आ रही है।विशेषज्ञों का कहना है कि फरवरी में भारत द्वारा सऊदी अरब से आयात में उल्लेखनीय बढ़ोतरी दर्ज की गई है। यह स्तर नवंबर 2019 के बाद सबसे अधिक माना जा रहा है।
दूसरी ओर, रूस से आयात में कुछ कमी देखी गई है, जिससे दोनों देशों के बीच का अंतर घटा है।ऊर्जा विश्लेषकों का मानना है कि भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए बहु-स्रोत रणनीति अपना रहा है। भारत किसी एक देश पर निर्भर नहीं रहना चाहता और कीमत, उपलब्धता तथा भू-राजनीतिक परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए खरीद नीति तय करता है।
यही कारण है कि समय-समय पर आयात के आंकड़ों में बदलाव देखने को मिलता है।इस बीच, अमेरिकी प्रतिनिधियों ने भी भारत से तेल खरीद को लेकर चर्चा की है। हालांकि भारत ने स्पष्ट किया है कि उसकी प्राथमिकता देश की ऊर्जा सुरक्षा है और वह अपने राष्ट्रीय हितों के अनुसार निर्णय लेता रहेगा। भारत का रुख संतुलित और व्यावहारिक रहा है, जिसमें आर्थिक लाभ और रणनीतिक संतुलन दोनों को महत्व दिया जाता है।
सऊदी अरब की ओर से उत्पादन और आपूर्ति में स्थिरता ने भी भारत के लिए उसे एक विश्वसनीय विकल्प बनाया है। इसके अलावा, पश्चिम एशिया में स्थिर आपूर्ति व्यवस्था और दीर्घकालिक अनुबंध भी इस बढ़त के पीछे अहम कारण माने जा रहे हैं।कुल मिलाकर, बदलते वैश्विक परिदृश्य में भारत की तेल आयात नीति लचीली और रणनीतिक बनी हुई है। यदि मौजूदा रुझान जारी रहे, तो सऊदी अरब आने वाले महीनों में भारत का सबसे बड़ा कच्चा तेल आपूर्तिकर्ता बन सकता है। यह बदलाव न केवल ऊर्जा बाजार बल्कि अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के स्तर पर भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।