छुआछूत मन के अन्दर की
लल्ला के आइज बियाह छल। ओ बहुत जिद कए अपन पसंद के लड़की सऽ बियाह केने छल। लल्ला एकटा मंडल परिवार सऽ छल। ओकर बड़का भाई बेसी होशियार नहि छल, एहि लेल घरवाला लोकनि ओकर बियाह नहि करौने छल। एहि कारण ई घरक पहिल बियाह छल।
पूरा गाम के नेवता देल गेल। मटकोर पूजा बहुत धूमधाम सऽ भेल। भोज-भात सेहो भेल। सभ लोक खुशी सऽ खाना खा कऽ अपन-अपन घर चल गेल।दोसर दिन बरात बहुत धूमधाम सऽ गेल। मुदा ओतय जा कऽ लोक सभकेँ पता चलल जे लल्ला एकटा नीच जातिक लड़की सऽ बियाह कऽ रहल अछि। 21वीं सदी मे दोसर जाति मे बियाह करब बहुत पैघ बात नहि अछि, मुदा छोट गाम लेल ई बहुत पैघ बात छल।भारत मे हर किछु दूरी पर भाषा आ खाना बदलि जाइत अछि। हर जातिक रहन-सहन आ खान-पान अलग होइत अछि। एक जातिक आदमी दोसर जातिक घर जाइत अछि तऽ तुरन्त बुझि जाइत अछि जे ई हमरा सभ सऽ अलग छथि।एतय तऽ पूरा बियाह छल, आ लल्लाक परिवार बिना बतौने पूरा गाम के दोसर गाम बियाह मे लऽ गेल छल। एहि बात सऽ लोक बहुत नाराज भऽ गेल।बरात वापस अबैत देरी गाम मे पंचायत बैठल। लल्लाक पिता उपेंद्र मंडल के खिलाफ फैसला लेल गेल। हुनकर परिवारक हुक्का-पानी बंद कऽ देल गेल।
मतलब आब ओ लोक गाम मे कोनो शादी-बियाह आ श्राद्धक भोज मे नहि जा सकैत छलाह।एहि बीच लल्ला आ ओकर पत्नी अपन मम्मी-पापा सऽ झगड़ा करैत छल। बेचारा उपेंद्र सोचैत छलाह जे की एहि बेटा लेल दुनिया सऽ लड़ल रही? मुदा लल्ला जान-बूझि कऽ खराब बनैत छल, ताकि ओकर मम्मी-पापा गाम सऽ दूर रहथि आ धीरे-धीरे लोक सभ बात बिसरि जाए।ई सच्ची कहानी अछि। हमर मम्मी हमरा ई कहानी सुनौलनि। लल्लाक दादी हमर घर मे काज करैत छलीह, एहि लेल ई बात लिखब आसान भेल। एहि सऽ पहिले हम छुआछूतक बारे मे बेसी नहि जानैत रही।आब लल्ला बनारस मे एकटा रेस्टोरेंट मे काज करैत अछि। ओकर गामक एक आदमी सेहो ओकरे बगल मे रहैत अछि। ओ आदमी लल्लाक हाथक बनल समोसा बहुत प्रेम सऽ खाइत अछि आ अपन परिवार लेल पैक सेहो करबैत अछि। मुदा ई ओहि आदमी छथि जे लल्लाक चाचाक मृत्यु पर ओकर पापा के अंतिम यात्रा मे जाए नहि देने छल। लल्लाक पापा बहुत कानल छलाह, मुदा केओ नहि सुनलक।एहि बात सऽ लल्ला दुखी भऽ जाइत अछि। ओ सोचैत अछि जे जँ लोक बनारस मे हमर हाथक बनल खाना खा सकैत अछि, तऽ गाम मे हमर छूला सऽ घर अपवित्र कोना भऽ जाइत अछि?धीरे-धीरे समय बदलल।
आब लल्लाक एक बेटी अछि। ओ अपन दादी लग गाम मे रहैत अछि। पहिने लोक सभ खाली बात करैत छल, मुदा आब धीरे-धीरे घर मे बोलाबऽ सेहो शुरू कऽ देने अछि।बनारस मे लोक खुशी सऽ लल्लाक हाथक खाना खाइत अछि, किएक तँ ओ महादेवक नगरी अछि। घुमए गेल लोक खुशी सऽ खाना खरीदिकऽ खाइत अछि, मुदा गाम मे आबियो जात-पात देखल जाइत अछि।
होटल मे लोक कोनो जातिक संग बैस कऽ खाना खा लैत अछि, मुदा गाम मे आबियो जातिक हिसाब सऽ पंक्ति मे बैसा कऽ खाना खिलाओल जाइत अछि। ई भेदभाव हम आइयो देखलहुँ। हमर बड़की नानीक बरसी मे किछु लोक पहिने आबि गेल छल।
हम कहलियनि जे पहिने हुनका सभकेँ खाना दऽ दिऔ। मुदा मामा जी कहलनि, “ई नीच जातिक छथि, पहिने खुआ देब तऽ ऊँच जातिवाला लोक नाराज भऽ जाएत।”21वीं सदी मे सेहो ई सब होइत देख बहुत अजीब लगैत अछि। कखनो-कखनो लगैत अछि जे ई सोच हमरा पूर्वज सभ सऽ भेटल अछि।