जब खर्चें कम थे ग़म भी कम थे
जब हमारे पास केवल किताबें थीं, तब जानकारी बहुत कम उपलब्ध होती थी। लेकिन जो भी जानकारी मिलती थी, वह प्रायः सही और विश्वसनीय होती थी। उस समय पढ़े-लिखे लोग ही अपने विचार समाज के सामने रख पाते थे।
लेकिन आज सोशल मीडिया के दौर में हर व्यक्ति स्वयं को प्रोफेसर समझने लगा है और अपनी-अपनी बातें लोगों तक पहुँचा रहा है। इसका परिणाम यह है कि कभी सही जानकारी मिल जाती है तो कभी गलत। सोचिए, यदि बिना फीस के वकील मुकदमा लड़ेंगे तो उस मुकदमे का क्या हाल होगा?आज हमें कोई भी जानकारी चाहिए होती है तो हम तुरंत गूगल या एआई के पास पहुँच जाते हैं।
जबकि साफ-साफ लिखा होता है कि यह जानकारी गलत भी हो सकती है। फिर भी जब तक गूगल या एआई से पुष्टि न कर लें, हमें संतोष नहीं होता।पहले लोग पंडितों से पूछकर काम करते थे, अब गूगल और एआई से पूछकर करते हैं। पहले यात्रा की दिशा और शुभ समय पंडित बताते थे, आज गूगल मैप हमें रास्ता दिखाता है।हम एक हद तक इंटरनेट पर निर्भर हो चुके हैं। ज़रा कल्पना कीजिए कि यदि एक दिन इंटरनेट न रहे तो हमारी ज़िंदगी कैसी होगी?हम उस मायाजाल से बाहर निकलना ही नहीं चाहते।
गर्मी लगी तो एसी चला लिया, घर में सब कुछ उपलब्ध हो गया तो बाहर जाने की ज़रूरत ही नहीं रही। लेकिन जब कभी फुर्सत में समाचार देखते हैं और पता चलता है कि एसी में शॉर्ट सर्किट होने से आग लग गई, लोग घायल हो गए या उनकी जान चली गई, तो हम सरकार को दोष देकर अगली रील देखने लगते हैं।लेकिन क्या हमने कभी यह सोचा कि एसी में आग क्यों लगी? क्योंकि वह लगातार चल रहा था और तार गर्म होकर आग का कारण बन गए। हमने एसी बंद नहीं किया क्योंकि गर्मी थी। और गर्मी क्यों थी? क्योंकि पेड़-पौधे लगातार काटे जा रहे हैं।लेकिन हमें तो सोशल मीडिया की दुनिया में ही जीना है। यदि ऐसा ही है, तो फिर ऑक्सीजन भी सोशल मीडिया से ही माँग लीजिए।थोड़ा समय निकालकर बाहर भी देखिए। पेड़ किस तेजी से कट रहे हैं, प्रकृति किस संकट से गुजर रही है, और पर्यावरण में कैसी हाहाकार मची हुई है। यदि अब भी नहीं जागे, तो आने वाली पीढ़ियाँ हमें कभी माफ़ नहीं करेंगी।
