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आपके विचारों को एक प्रभावशाली लेख के रूप में इस तरह लिखा जा सकता है:गर्मी से राहत नहीं, एसी ब्लास्ट की खबरें मिल रही हैंगर्मी कम होने का नाम नहीं ले रही, लेकिन आए दिन एयर कंडीशनर फटने और आग लगने की घटनाएं सुनने को मिल रही हैं। सवाल यह है कि आखिर हम किस दिशा में बढ़ रहे हैं?हम विकास के नाम पर लगातार पेड़ काट रहे हैं, जंगल खत्म कर रहे हैं, नदियों को प्रदूषित कर रहे हैं और बड़ी-बड़ी फैक्ट्रियां खड़ी कर रहे हैं। हमें लगता है कि यही तरक्की है, जबकि सच यह है कि हम अपनी आने वाली पीढ़ियों का भविष्य कमजोर कर रहे हैं।कोरोना लॉकडाउन के दौरान जब ऑक्सीजन की कमी से लाखों लोग परेशान हुए, तब लगा था कि शायद इंसान प्रकृति की अहमियत समझेगा। लगा था कि लोग पेड़ बचाएंगे, पर्यावरण का सम्मान करेंगे और अपनी जीवनशैली बदलेंगे। लेकिन जैसे ही लॉकडाउन खत्म हुआ, सब कुछ पहले जैसा हो गया। कुछ समय के लिए हमारी रफ्तार धीमी हुई थी, सोच नहीं बदली।आज हम हर सुविधा के आदी हो चुके हैं। पहले एक साबुन से हाथ, चेहरा और शरीर सब साफ हो जाता था। अब हैंडवॉश, फेसवॉश, बॉडीवॉश और न जाने कितने अलग-अलग उत्पाद हमारी जरूरत बना दिए गए हैं। पहले हाथ से पंखा झलते थे, जिससे शरीर भी सक्रिय रहता था। आज हर काम के लिए इलेक्ट्रॉनिक उपकरण हैं और धीरे-धीरे हम शारीरिक रूप से आलसी होते जा रहे हैं।विडंबना यह है कि पर्यावरण बचाने की सबसे ज्यादा बातें भी अक्सर एसी वाले कमरों में बैठकर की जाती हैं। बिना एयर कंडीशनर के अब बहुत से लोगों को नींद तक नहीं आती। यह सुविधा गलत नहीं है, लेकिन जब जरूरत और निर्भरता में फर्क मिट जाता है, तब समस्या शुरू होती है।अगर हम सिर्फ 20 साल पीछे मुड़कर देखें, तो पाएंगे कि संसाधन कम थे, लेकिन संतोष और अपनापन कहीं ज्यादा था। आज हमारे पास सुविधाएं बढ़ गई हैं, लेकिन सुकून कम हो गया है। हम खुश रहने से ज्यादा, खुश दिखाई देने की कोशिश में लगे हैं।तरक्की वही है जो इंसान और प्रकृति दोनों को साथ लेकर चले। अगर विकास की कीमत पेड़, नदियां, हवा और आने वाली पीढ़ियों का भविष्य है, तो यह विकास नहीं, विनाश है।

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