shrapit chitrakaar
चित्रकार को श्रापबहुत समय पहले पहाड़ों और घने जंगलों से घिरे एक छोटे से गाँव में आर्यन नाम का एक प्रसिद्ध चित्रकार रहता था। उसकी बनाई हुई तस्वीरें इतनी जीवंत होती थीं कि लोग कहते थे, “उसके रंगों में जादू बसता है।”एक दिन आर्यन ने अपनी कल्पना से एक अद्भुत सुंदरी का चित्र बनाया। उसकी आँखें झील जैसी गहरी थीं, चेहरे पर चाँद जैसी चमक थी और मुस्कान में अनोखा आकर्षण था। चित्र पूरा होते ही आर्यन ने उसे अपने कमरे की दीवार पर टांग दिया।
अगली सुबह जब वह उठा तो उसे लगा कि चित्र कुछ बदला-बदला सा है। उसने ध्यान नहीं दिया। लेकिन कुछ दिनों बाद गाँव वालों के बीच एक अजीब चर्चा फैलने लगी।लोग कहते थे कि हर सुबह एक रहस्यमयी सुंदरी गाँव की गलियों में घूमती दिखाई देती है। वह किसी से बात नहीं करती थी, बस मुस्कुराकर चली जाती थी। शाम होते ही वह अचानक गायब हो जाती।एक दिन आर्यन ने देखा कि सुबह उसकी बनाई हुई तस्वीर दीवार से गायब थी। वह घबरा गया। शाम को जब वह कमरे में लौटा तो तस्वीर फिर अपनी जगह पर मौजूद थी।
अब उसे समझते देर नहीं लगी। उसकी बनाई हुई सुंदरी ही हर दिन चित्र से निकलकर गाँव में घूमने जाती थी।आर्यन ने उसका रहस्य जानने के लिए कई तरकीबें अपनाईं। उसने कमरे का दरवाज़ा बंद किया, चित्र पर कपड़ा डाला, यहाँ तक कि उसे लोहे की जंजीरों से भी बाँध दिया। लेकिन हर सुबह वह सुंदरी किसी न किसी तरह चित्र से बाहर निकल आती और शाम को वापस लौट जाती।दिन बीतते गए। आर्यन का डर बढ़ता गया। उसे लगने लगा कि कहीं उसकी यह रचना किसी बड़े अनर्थ का कारण न बन जाए।आख़िरकार उसने निश्चय किया कि वह उस चित्र को जला देगा।उस रात उसने चित्र को कमरे के बीच रखा और आग लगाने की तैयारी करने लगा। तभी चित्र से वही सुंदरी बाहर आई।उसकी आँखों में आँसू थे।”आर्यन,” उसने धीमे स्वर में कहा, “मुझे मत जलाओ।”चित्रकार चौंक गया।”तुम कौन हो?” उसने पूछा।सुंदरी मुस्कुराई।”मैं तुम्हारी कल्पना हूँ। तुम्हारे रंगों और सपनों से जन्मी हूँ। हर दिन मैं इस दुनिया को देखने निकलती हूँ।””लेकिन तुम्हारा अस्तित्व अस्वाभाविक है,” आर्यन बोला, “तुम्हें समाप्त होना ही होगा।”सुंदरी की आँखें नम हो गईं।”मुझे तुमसे प्रेम हो गया है। अगर मैं चली गई तो मेरा प्रेम अधूरा रह जाएगा।”कुछ क्षण के लिए आर्यन का हृदय पिघल गया। लेकिन उसने अपने निर्णय को नहीं बदला।उसने मशाल उठाई और चित्र को आग लगा दी।जैसे ही लपटें उठीं, सुंदरी दर्द से चीख पड़ी। उसका शरीर धुएँ में बदलने लगा।वह क्रोध और पीड़ा से काँपते हुए बोली—”आर्यन! तुमने अपने ही प्रेम और अपनी ही कल्पना को नष्ट कर दिया है। इसलिए मैं तुम्हें श्राप देती हूँ कि आज के बाद तुम कोई चित्र नहीं बना सकोगे। तुम्हारी कल्पना करने की शक्ति सदा के लिए समाप्त हो जाएगी।”यह कहकर वह अग्नि की लपटों में विलीन हो गई।आर्यन हँस पड़ा।”एक कल्पना मुझे क्या श्राप देगी?” उसने कहा।अगली सुबह वह फिर अपने कैनवास के सामने बैठा। उसने ब्रश उठाया और चित्र बनाने की कोशिश की।लेकिन उसके मन में कोई विचार नहीं आया।उसने फिर प्रयास किया।कुछ नहीं हुआ।जैसे-जैसे वह चित्र बनाने की ज़िद करता गया, उसका शरीर भारी होने लगा। उसकी उंगलियाँ कठोर हो गईं। उसके पैर ज़मीन से चिपक गए।कुछ ही क्षणों में उसका पूरा शरीर पत्थर में बदलने लगा।तब उसे सुंदरी के श्राप का अर्थ समझ आया।लेकिन अब बहुत देर हो चुकी थी।देखते ही देखते वह स्वयं एक पत्थर की मूर्ति बन गया।गाँव वालों ने जब यह दृश्य देखा तो वे भयभीत हो गए।
उन्होंने उस मूर्ति को गाँव के चौक में स्थापित कर दिया।कहा जाता है कि आज भी वह मूर्ति उसी गाँव में खड़ी है। बुज़ुर्ग अपने बच्चों को उसकी कहानी सुनाते हैं और कहते हैं—”ईश्वर की दी हुई कला का घमंड मत करना, और अपनी कल्पनाओं का सम्मान करना। क्योंकि कभी-कभी हमारी रचनाएँ ही हमारी सबसे बड़ी शक्ति होती हैं, और उनका अपमान हमारा सबसे बड़ा विनाश बन सकता है।”
