पहिली बार कैसे करए वटसावित्री पूजन
डीएलएफ अंकुर विहार में बड़े ही धूमधाम से वटसावित्री पूजा मनाई गई। यह पर्व मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश और बिहार के ब्राह्मण तथा कायस्थ समाज में पति की लंबी आयु के लिए मनाया जाता है। इस व्रत में महिलाएं पूरे दिन उपवास रखती हैं और शाम होने से पहले कुछ मीठा ग्रहण करती हैं।

पूजा की विधिइस पूजा में महिलाएं सुबह जल्दी उठकर स्नान करती हैं और नए वस्त्र धारण करती हैं। इसके बाद वे सोलह श्रृंगार करती हैं तथा मांग से लेकर माथे तक सिंदूर लगाती हैं। फिर आभूषण पहनकर स्वयं को सजाती हैं और पूजा की सामग्री लेकर वट वृक्ष की पूजा करने जाती हैं। जिनके आसपास वट वृक्ष नहीं होता, वे उसकी टहनी लाकर भी पूजा करती हैं।पूजन सामग्रीपूजा में पाँच प्रकार के फल और मिठाई को टोकरी में सजाया जाता है।

साथ ही फूल, कलावा, जल से भरा लोटा, हाथ से बना पंखा, कुछ अंकुरित चना और गौरी माता की प्रतिमा रखी जाती है, जिसे हर सुहागिन स्त्री अपने पूजा घर में रखती है।पूजा कैसे करेंसबसे पहले गौरी माता को साफ वस्त्र पहनाकर उनकी पूजा की जाती है। फिर उनके लिए प्रसाद निकाला जाता है। इसके बाद वट वृक्ष के लिए अलग से प्रसाद रखा जाता है।

धूप और दीप जलाकर फूल अर्पित किए जाते हैं। फिर पहले से तोड़कर रखी गई वट वृक्ष की दो टहनियों को अपने पैर के नीचे रखकर कथा सुनी जाती है।इसके बाद रोली लेकर वट वृक्ष के तीन चक्कर लगाए जाते हैं। फिर हाथ से बने पंखे को तीन बार झलते हैं और तीन बार पेड़ को जल अर्पित किया जाता है। जल वाले लोटे पर आम का पत्ता रखना आवश्यक माना जाता है। पूजा के बाद महिलाएं स्वयं प्रसाद ग्रहण करती हैं। इसके बाद तीन बार वट वृक्ष को गले लगाया जाता है। अंत में सभी प्रसाद पर तीन बार जल छिड़ककर भगवान को समर्पित किया जाता है।

घर लौटने के बाद महिलाएं अपने पति के पैर धोकर प्रणाम करती हैं और उसी पंखे से उन्हें हवा करती हैं। फिर शाम होने से पहले खीर और आम खाना शुभ माना जाता है।
नोट — यह विवरण मिथिला के रीति-रिवाजों के अनुसार लिखा गया है। हर समुदाय में इस पूजा की विधि अलग-अलग होती है। आपके यहां यह पूजा कैसे मनाई जाती है, जरूर बताइए।
